Latest News

Labour Ministry revives National Policy to increase domestic helps' wages    |     Social Security Code provides for linking fine with inflation    |     Government to push for labour bills that pay ahead of polls    |     May Day: Justice denied as less than 2% of workers get assured pension    |     Parliamentary panel finalises report on Wage Code Bill, says Gangwar

Poems/Literature

अपने मसीहा के ख़िलाफ़

access_time14:07:2018 chat_bubble_outline(0)

जब बोलता हूँ तो उन्हें बुरा लगता है क्योंकि ये जो शब्द बान हैं ज्यादा गहरे  घाव कर जाते हैं लेकिन ये घाव उन घावों से ज्यादा दुखदायी नहीं हो सकते हैं जो तुमने वर्षों से  मेरी आत्मा में सुई चुभोकर घाव किये हैं  मेरी अगुआवाई का जिम्मा लेकर जिस अंधेर कमरे में हमे धकेला है  आज ये आवाज  उसी कमरे के घुटन से पैदा हुई है  जिसमे हम तुम्हारी धूर्तता से  पीढ़ी दर पीढ़ी घुटते रहे और तुम, रौशनी में, हमारे मसीहा बनते रहे ये आवाज, उस मसीहे के भी खिलाफ है ये आवाज, उस सत्ता के भी खिलाफ है हम ये आवाज  रास्ता ढूंढ़ने के लिए नहीं लगा रहे हैं बल्कि उस शोषक और हमारे मसीहा दोनों के  बनाये उस तिलिस्मी कारागार  को उड़ा देने के लिए लगा रहे हैं आवाज से जब वो इतना दुःखी हो रहा है  तो सोंचो उनके तिलिस्म के टुकड़े  जब उनपर गिरेंगे तो क्या होगा ? वो बौखलायेंगे, चिल्लायेंगे,  मिलकर हमले करेंगे इतना ही नहीं  हमारे ही टुकड़े करने की कोशिशें करेंगे घबराना नहीं, बहक जाना नहीं  ये तम मिटेगा उजाला आएगा ,  इस रात की सुबह जरूर होगी बस अपनी आवाज़ें बुलंद करते रहो उनके ख़िलाफ़ जो हमे लूटते रहे  और अपने मसीहे के ख़िलाफ़ जिसने हमे लड़ने नहीं दिया Author: Ranvijay Kumar (Social and Political activist, associated with many civil and political movement. To read more his writings please visit his personal blog by clicking here)  Pics Credit: http://ideasmakemarket.com/2015/01/direct-democracy-possible-india.html 

क्योंकि मैं मजदूर हूँ l

access_time02:06:2018 chat_bubble_outline(0)

तेरे वादों के करीब, तेरे कृत्यों से दूर हूँ, हक़ की बात नहीं करता, क्योंकि मैं मजदूर हूँ l हर सितम सहता हूँ, उफ़ नहीं करता हूँ, तख़्त नहीं पलटता मजबूर हूँ, क्योंकि मैं मजदूर हूँ l खड़ा रहता हूँ चौराहे पर, ताकि दो हाथों को काम मिले, रोटी की जद्दोजहद में चूर हूँ, क्योंकि मैं मजदूर हूँ l खेतों में या अट्टालिकाओं पर, खून जलाता दिख जाता हूँ, बदबूदार पसीने से सराबोर हूँ, क्योंकि मैं मजदूर हूँ l तेरी कुर्सी की ओर देखते, पीढियां बीत गई सोंचते, बदलाव और विकास से दूर हूँ, क्योंकि मैं मजदूर हूँ .... Courtesy: Poem has been taken from personal blog of Ranvijay Kumar, please visit his personal blog to read more his writings https://ranvijayblog.blogspot.com/2018/05/blog-post_44.html   

अन्नदाता

access_time29:05:2018 chat_bubble_outline(0)

मैं अन्न दाता हूँ मैं देश का भाग्य विधाता हूँ । ऐसा कहने वाले तुम हो मैं सुनकर चुप रह जाता हूँ । आशा बस इतनी है कि तेरे भाषणों में अभी आता हूँ । तेरे भाषण से पेट नहीं भरता मैं भूखा रह जाता हूँ । तुम बारिश में छतरी ओढ़ लेते हो मैं उसमे भीग कर खिल जाता हूँ । तुम महलों में चैन से सोते हो मैं झोपडी में बिलबिलाता हूँ । बाढ़ सुखाड़ ओला वृष्टि सबकी चोट मैं खाता हूँ । फिर तेरे वादों के मरहम से खुद को तसल्ली देता हूँ । मरहम तेरे अधिकारी खाते मैं खाली हाँथ लौट आता हूँ । ले जा अपने वादे भाषण मै खेती छोड़ जाता हूँ । नहीं बनना मुझे भाग्य विधाता ना हीं देश का अन्न दाता हूँ ..... Author: Ranvijay Kumar, a social activist based in patna, associated with various right based movement for more than 10 years, please write him at ranvijay.kr@gmail.com

1  2  3  

Unique visitors