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Politics

क्यों लोग एक घटना में सड़क पर उतरते हैं और दूसरे में नहीं ?

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सामाजिक सरोकारों को लेकर समाज में चिंतन का तक़रीबन शून्यता के स्तर तक पहुँच जाना, चिंता का विषय है। एक तरफ तो इसने हमारे बीच संवेदनहीनता को बढ़ावा दिया है, वहीँ दूसरी ओर हैवानियत को पोषित भी किया है। पक्ष और विरोध की धारा में हम इस तरह बंटे हैं कि जब किसी घटना के बाद कोई भी नागरिक पहल होती है, तो कुछ लोग इसपर सवाल करते हैं। इसे हमेशा किसी दल के पक्ष समर्थन या विरोध के रूप में देखा जाता है। ऐसी-ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं, मानो इंसानियत समुद्रतल में कहीं डूब गया हो। आज सोशल मीडिया, समाज में अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा साधन एवं मंच है। अतिश्योक्ति न होगी अगर यह कहा जाय कि सोशल मीडिया पर जो तस्वीर बन रही है वह हमारे समाज का प्रतिबिम्ब है। जो प्रश्न सोशल मीडिया पर पूछे जाते हैं वे हमारे समाज के बंटवारे (खासकर राजनीति से प्रेरित) एवं द्वंद्वों की ही अभिव्यक्ति है। ऐसे में यह आवश्यक है कि इन प्रश्नों को अनुत्तरित न छोड़ा जाये। हमें साझा तौर पर इन प्रश्नों के सैद्धांतिक और तार्किक जवाब ढूँढने का प्रयास करना चाहिए। मैंने सोशल मीडिया पर जो सबसे ज्यादा प्रश्नों को देखा है और सामना किया है वो है “आप फलां घटना पर तो बोलते हैं, फलां घटना पर क्यों नहीं बोलते”। मैं दो हालिया घटनाओं के मार्फ़त चर्चा को आगे ले जाना चाहता हूँ। पहली घटना जब बक्सर के नंदगाँव में दलितों पर पुलिसिया जुर्म हुआ तब पटना में सोशल एक्टिविस्टों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, लेखकों ने मिलकर एक प्रतिरोध मार्च का आयोजन किया जिसमें मैं भी शामिल था। इस कार्यक्रम की तस्वीर अख़बारों में आने के बाद मेरे कई साथियों ने सोशल मीडिया के मार्फत पुछा कि “आप के पास कोई काम-धाम नहीं है क्या?” “आप इन घटनाओं का विरोध करते हैं बाकी में चुप क्यों रहते हैं? ...” कठुआ में हुई बलात्कार की घटना के बाद जब कैंडल मार्च निकला गया तब भी यह पूछा गया कि “इसमें क्यों?” जहानाबाद का विडियो जब वायरल हुआ तो लोग सड़क पर आये। पुनश्च: ये सवाल सामने आया। इसके बाद जब मंदसौर की हैवानियत की खबर आई तो फिर पूछा गया कि “आज चुप क्यों?” इस तरह की कई घटनाएँ हैं जब ऐसे सवाल पूछे गए। अब यहाँ जो लोग सवाल पूछ रहे हैं उनके बारे में भी जानना जरूरी है क्योंकि सैद्धांतिक तौर पर दिया जाने वाला जवाब तो सवाल पूछने वाले की प्रकृति/चरित्र के अनुसार नहीं बदलेगा, लेकिन सबसे पहले किन प्रश्नों का उत्तर देना है, उसके चयन में यह निर्णायक भूमिका निभाता है। ऐसे सवाल पूछने वाले ज्यादा लोग “डेवलपमेंट सेक्टर/सोशल सेक्टर” अर्थात सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाले हैं। जिन्हें कायदे से तो इस पहल में शामिल होना चाहिए था लेकिन अपने अंतर्द्वंद्वों एवं सैद्धांतिक/तार्किक अस्पष्टता के कारण दूर खड़े सवाल कर रहे हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि ये राजनीति है/राजनैतिक मसला है/ राजनीति से प्रेरित है। क्योंकि जिन घटनाओं में पहल हुई है वो सीधे तौर पर सरकार के विरुद्ध हैं। उन्हें लगता है कि ऐसे पहल में शामिला न होकर वो राजनीति का हिस्सा बनने से बचते हैं। उन्हें यह नहीं मालूम कि दोनों परिस्थितियों में ही वे राजनीति के हिस्सा होते ही हैं। खैर, इस पर किसी और दिन चर्चा करेंगे। आज यहाँ सर्वप्रथम उस प्रश्न का उत्तर तलाशने की कोशिश करेंगे जो हमसे दूर खड़े साथियों के अंतर्द्वंद्वों को समाप्त करने की कोशिश करे और वे हमारे साथ खड़े हो सकें। इतना ही नहीं, उनको सैद्धांतिक/तार्किक तौर पर मजबूत करें जो कई बार साथ आते हैं पर उनके मन में वह सवाल उठता रहता है कि इस घटना में क्यों ? उस घटना में क्यों नहीं ? यहाँ एक घटना का वर्णन करना समीचीन होगा कि कठुआ मामले में पटना में आयोजित कैंडल मार्च में एक महिला साथी ने भाग लिया, लेकिन घर उन्होंने आकर फेसबुक के मार्फ़त सवाल खड़ा किया कि कठुआ मामले में लोग खड़े हो रहे हैं और बाकी मामले में लोग चुप रहते हैं, ऐसा क्यों? उन्होंने उस मामले को धर्म से जोड़कर भी देखा। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि पक्षधरता के प्रश्नों का उत्तर तलाशा जाये। सर्वप्रथम तो यह समझना जरूरी है कि हमारे देश के संविधान ने सभी नागरिकों को न्याय का समान अधिकार दिया है। अगर किसी के साथ अन्याय होता है तो वह पुलिस, न्यायालय के पास न्याय हेतु जा सकता है। इसमें सबसे पहली कड़ी है पुलिस, उसके बाद है न्यायालय और आखिर में सत्तासीन लोग, क्योंकि कई मामलों में उनका पहल जरूरी होता है। अर्थात् अगर आपके साथ अन्याय होता है तो सर्वप्रथम पुलिस के पास जायेंगे जो आपकी रक्षा करेगी। इसके बाद आप न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। किसी गाँव में एक अपराधी ने किसी की हत्या कर दी। पुलिस ने थाने में केस दर्ज कर अपराधी को गिरफ्तार कर लिया अथवा सभी कानूनी प्रक्रिया पूरी अपराधी को पकड़ने की कोशिश कर रही है। दूसरी घटना में एक दबंग/पुलिसकर्मी ने एक व्यक्ति की हत्या कर दिया। पुलिस केस दर्ज नहीं कर रही है। या जानबूझ कर अपराधी को बचाने का प्रयास कर रही है। दोनों ही घटना में एक व्यक्ति की हत्या हुई है लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि प्रथम घटना में पीड़ित पक्ष के संविधान प्रदत्त अधिकारों के अंतर्गत न्याय एवं संरक्षण की प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं है। जबकि दुसरे केस में पुलिस, जिससे संरक्षण की दरकार थी वह हमले कर रही है या उससे इन्कार कर रही है। जाहिर है यहाँ पीड़ित असहाय है, ऐसे में समाज की भूमिका बनती है कि वह उसकी मदद करे और न्याय के लिए आवाज उठाये। स्टष्ट तौर पर कहें तो “अगर व्यक्ति आप पर हमला करता है तो पुलिस और न्याय व्यवस्था के पास जा सकते हैं, लेकिन पुलिस हमला करे और आपको न्याय पाने से रोके तो आपके न्याय की उम्मीद समाप्त हो जाती है जो हर व्यक्ति का अधिकार है। इसलिए लोग दूसरी घटना में सड़क पर आयेंगे। जहानाबाद मामले में पुलिस ने जिस प्रकार से सामूहिक बलात्कार को छेड़छाड़ का मामला बनाकर दर्ज और पेश किया, कठुआ मामले में पुलिस की संलिप्तता और वकीलों का विरोध किया, ऐसे में नागरिक पहल आवश्यक था। नंदगाँव में पुलिस ने पीटा, केस किया और गर्भवती महिला एवं किशोरियों को घसीट कर थाने ले गई। इसके साथ ही यह समझना भी जरूरी है कि नागरिकों के द्वारा जब भी पहल होगी तो वह सत्ता के विरुद्ध ही प्रतीत होगी, क्योंकि व्यवस्था को दुरुस्त और न्यायपूर्ण रखना उसका कर्तव्य है। उनसे कर्तव्यों में चूक होती है, तभी नागरिकों के पहल की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही कई घटनाओं,मसलन भीड़ की हत्या के विरूद्ध भी नागरिकों द्वारा पहल होती है, खासकर तब जब सरकार में बैठे लोग चुप हों, क्योंकि भीड़ इसे मौन सहमति समझता है, इससे भीड़ को शह मिलता है। हिंसा का कोई भी रूप स्वीकार्य नहीं है, लेकिन सबसे ज्यादा खरतनाक हिंसा वह है, जिसमें व्यवस्था (पुलिस, प्रशासन, न्यायालय) शामिल हो या जिसे सत्ता में बैठे लोगों का समर्थन प्राप्त हो। ऐसे घटनाओं में हमें पहल करना चाहिए। यही हमारी पक्षधरता है, और सामाजिक धर्म भी, हम कमजोर के साथ खड़े हों । और सबसे सरल अर्थ में कमजोर वही है, व्यवस्था जिसके खिलाफ है। Author: Ranvijay Kumar (Social and Political activist, associated with many civil and political movement. To read more his writings please visit his personal blog by clicking here)  Pics: http://www.newclearvision.com/2011/07/22/the-power-of-social-movements/

जे पी के नाम पत्र

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सेवा में, लोकनायक जय प्रकाश नारायण, स्वर्ग लोक, आसमान   द्वारा : नारदमुनि, स्वर्गलोक डाक सेवा, इन्द्रपुरी. विषय: बिहार आगमन के सन्दर्भ में.   माननीय  महोदय , क्षमा कीजियेगा अगर यह संबोधन उचित न हुआ तो क्योंकि मैं आपके चेलों के तरह न ही लच्छेदार भाषण जानता हूँ ना ही उतनी अच्छी भाषाई पकड़ है. ये अलग बात है कि ये भी आपके चेलों के मेहरबानी से ही है, क्योंकि जब इस प्रदेश की बागडोर आपके चेलों के हाथ में आई (आपकी मेहरबानी से या आपके गलत निर्णय से या इन्होने आपको धोखा दिया ये तो आप ही बेहतर बता सकते हैं) इन्होने सबसे पहले सरकारी शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त किया ताकि गरीब गुरबों के बच्चे पढ़ ना सके. अब तो बच्चों को कुल प्राप्तांक 50 के पेपर में 60 अंक आते हैं ... गुरूजी गाय, बकरी गिनते हैं और चुनाव करवाते हैं और बच्चे खिचड़ी खाकर घर चले जाते हैं ... आपको बताऊँ कि आपके चेले बहुत चालू हो गए हैं इन्होने एक तीर से दो निशाने लगाये हैं पहली की राज्य में निजी शिक्षा का जबरदस्त धंधा जमाया है जिसका लाभ इन्हें भी मिलता है, और दूसरी की जब अच्छी शिक्षा व्यवस्था नहीं होगी तो गरीब लोग पढ़ लिखकर अपना हक़ नहीं मांगेगे और इनके पीछे जिंदाबाद-मुर्दाबाद करेंगे. ये मत समझिएगा कि मैं आन्दोलन या मुद्दा आधारित संघर्ष के विरुद्ध हूँ लेकिन जिस प्रकार का संघर्ष इन्होने कायम किया हुआ है उसके पीछे जिन्दाबाद-मुर्दाबाद तो कोई भी पढ़ा-लिखा सजग इन्सान नहीं करेगा. अब आप परेशान हो रहे होंगे कि अभी ये सब आपको क्यों बता रहा हूँ ... ऐसा है कि जो स्वर्ग सिधार जाते हैं (जैसा मुझे लगता है कि आप अपने अच्छे कर्मों से वहीं गए होंगे) उन्हें दो ही दिन याद किया जाता है एक जन्मदिन के दिन दूसरा मरन दिन के दिन.. खैर ये परंपरा तो राजनीति की है और मैं न कोई राजनेता हूँ न ही आपका चेला... आगे जो बताने जा रहा हूँ यह मान कर ही बताऊंगा कि अभी तक आपको अपने चेलों से भेट नहीं हुई होगी (क्योंकि आपके बाद उन्होंने जो किया उसके बाद आप जहाँ हैं वहां तो वे जा नहीं सकते हां विपरित वाले मकान में होंगे) नतीजतन आपको यहां की खबर नहीं होगी. आप सोंच भी रहे होंगे कि  मेरे जाने के बाद क्या हुआ सो मैंने आपको खबर करने का बीड़ा उठाया है ... हाँ एक बात तो बताना हीं  भूल गया कि अभी क्यों जबकि न आपके स्वर्ग सिधारने का दिवस है न ही जन्मदिन ... मुझे लगता है कि आपको याद होगा कि  5 जून 1974 को आपने सम्पूर्ण क्रांति का नारा दिया था गाँधी मैदान में और अभी जून का महिना है ... अब आपके चेले ने तो इस दिवस का कुछ किया नहीं भले सीता नवमी को सरकारी छुट्टी बना दिया.... मेरे लिए तो पूरा महिना समपूर्ण क्रांति का है तो इस महीने थोड़ा ज्यादा एक्टिव हो गया हूँ (लिखने लगा हूँ ब्लॉग और फेसबुक पर) सो सोंचा कि आपको एक पत्र लिख दूँ ... अब आपके चेलों (प्रचंड चेलों की बात करूँगा) की बात बताता हूँ ... एक जो था मचंड उसको सबसे पहले सत्ता मिली और सबसे पहले उसने आपके आदर्शों को शीशा वाला बोइयाम में बंद करके ताख पर रख दिया और जनता को इतना परेशान किया कि उसको जंगल राज कहा जाता है ... अब ये अलग बात है कि जंगल में भी इतना ज्यादा अंधेरगर्दी होता है कि नहीं ये तो जंगल का जानवर सब ही बताएगा और उससे बात करने का भाषा हमको आती नहीं ... तो जब आपका इ समूह वाला चेला सब आपके पास या आपके सामने वाला मकान में जायेगा, तो ओकरे जंगल में भेजिएगा जानवर सब से बात करने... आपके इ चेलवा का एगो खूबी है इ धर्मनिरपेक्षता का पोषक है लेकिन ज्यादा मुस्कुराइए मत कि आपके सिद्धतांत को मानता है .. इ सब खाली वोट के खेला है ... अभी फुलवारी में जब झड़प हो गया तब उसमे दुनो एकर वोटर था ... एही डरे कौनो नहीं गया ... खैर ये निर्णय आपही ले लीजिये..  इसके उपरांत आपके दुसरे चेला का नंबर आता है ... जनता इतनी दुखी थी कि आपके इस चेले में लोगों को आशा दिखी कि कुछ बदलेगा ... और कुछ बदलाव हुआ भी कम से कम अब आप बिहार आयेंगे तो सड़क मार्ग से अपने सभी आन्दोलनकारियों से मिलने जा सकेंगे बस गाड़ी बड़ा रखना होगा... वो क्या है कि सबको आदत थी कच्ची सड़क या टूटे हुए सड़क के किनारे रहने का... अब सड़क बन गया तो गाड़ी तेज चलती है और सबको डर लगता है ... सब अपने अपने घर के सामने इतना ऊँचा-ऊँचा ब्रेकर बना दिया है ... ब्रेकर तो अब समाज में हर दबंग (बेवकूफ) के घर के सामने बन गया है... खैर आपके इस चेले की सबसे बड़ी खूबी है बंदी (प्रतिबन्ध, निषेध) ... इन्होने ढेर सारी बंदी की है ... शराब बंदी, दहेज़ बंदी, बाल विवाह बंदी अब खैनी बंदी भी होने वाला है .... अब आपके इस चेले को बंदी ही हर समस्या का समाधान लगता है ... हो सकता है कि आने वाले समय में जनसँख्या नियंत्रण के लिए विवाह की बंदी भी कर सकता है... आपके चेलों का तीसरा समूह जो है; वो अभी और पहले भी शासन में तो रहा लेकिन दूसरे चेले के साथ ही रहा... ये हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़ाते हैं ताकि इनकी राजनीति हिंदुत्व के मुद्दे पर चलती रहे और आपके पहले समूह के चेले की राजनीति मुसलमानों को बचाने के दम पर चलती रहे... आपके चेलों के इस समूह में तो कई ऐसे लोग हैं जो केंद्र के जनसंघ (अब उसे भाजपा कहते हैं ये जानकारी तो आपको है ही फिर भी लिख दिया ताकि सनद रहे) सरकार में मंत्री हैं और एक जो है (जिसको आपने स्टीयरिंग कमिटी में रखा था ) वो लोगों को ये समझाने की कोशिश कर रहा है कि अभी जो संविधान है वो डुप्लीकेट है और ओरिजिनल वाला उसके पास है ... वो संविधान बदलने की कवायद कर रहा है ... मैं तो उस समय था नहीं आप ही थे तो आप ही बेहतर बता सकते हैं कि ओरिजिनल वाला कौन है ... आपके चेलों का एक और समूह है जो सीधे तौर पर इन तीनों के साथ तो नहीं है पर इनका पक्षसमर्थन करता है और आपके सिद्धांत के बारे में कम से कम बात तो करता ही है.... इसमें से ज्यादा लोग राजधानी की विभिन्न वातानुकूलित कमरे में संघर्ष और 74 की बात करते मिल जायेंगे ... कुछ हैं जो कोशिश में लगे हैं आपके दिशानिर्देशों के अनुसार लेकिन किसी भी नये विकल्प के विरुद्ध हैं और ज्यादातर अप्रत्यक्ष रूप से तीनों में से किसी न किसी का समर्थन करते रहते हैं.... अब इनका बूढ़ा तन और मन कोई बदलाव नहीं ला सकता ... इनमे आप वाली बात नहीं है... अब आपको ही आना पड़ेगा ... अंत में आपसे निवेदन है कि आप आइये हम सब आपके साथ खड़े होने को तैयार हैं ... एक बात लेकिन बता दे रहा हूँ कि नये लोगों के नेतृत्व के लिए आपको अपने मन और तन को तैयार करना होगा ... अपने पूर्व के चेलों के भरोसे मत आइयेगा नहीं तो जिनको आपने प्रधानमंत्री बनाया था उन्होंने जो टका सा जवाब आपको दिया था वही इनसबसे आपको मिलेगा ... विश्वासभाजन, रणविजय कुमार  एक पीड़ित और आशान्वित बिहारी   (He is an activist, based in Patna, to read more his writing visit his personal blog https://ranvijayblog.blogspot.com/ ) Pics Credit: The Indian Express

नया नहीं, लोकतांत्रिक मूल्यों वाला भारत चाहिए

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वर्तमान राजनैतिक स्थिति में सत्ता के बाहर जो मुद्दों की राजनीति है उसमे एक स्पष्ट निराशा दिखाई देती है . ऐसा इसलिए है कि इसमें एक सीधा लकीर खींचने की कोशिश की जा रही है जबकि सत्ता के परे जो राजनीति होती है वह आम सरोकार के मुद्दे पर होती है . वर्तमान सत्ता से बुद्धिजीवी वर्ग भी इतना आतंकित है कि कुछ नया सोंच हीं नहीं पा रहा है और तथाकथित जो सेक्युलर राजनैतिक दल है जिनका सत्ता पाने के अलावे और कोई लक्ष्य नहीं है के पक्ष में खड़े हो गए हैं और उन्हीं में अपना भविष्य देख रहे हैं . ये बुद्धिजीवी, सेक्युलरिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट, चाहे जो अपने आप को जिस नाम से पुकारते हों, से मेरा अभिप्राय सिर्फ उनसे है जो प्रजातान्त्रिक मूल्यों को मानते हैं, और उसके प्रति अपनी आस्था जताते हैं . ये सबके सब निराशावादी, कमजोर और दंतविहीन हो चुके मालूम होते हैं क्योंकि इनकी रचनात्मकता समाप्त हो चुकी है या ऐसा सिर्फ इसलिए है कि ये समर्पण कर चुके हैं . ऐसा कहने के पीछे कुछ कारण है . पहला कारण यह कि भ्रष्टाचार के जिस आड़ में सांप्रदायिक ताकते आगे बढ़ रही हैं उसका जवाब इनके पास नहीं है क्योंकि ये विकल्प तैयार करने के बजाय भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे राजनेताओं के साथ खड़े हो जाते हैं . ऐसा नहीं है कि जो पार्टी भ्रष्टाचार को अपना मुद्दा बना रही है उनके नेता भ्रष्ट नहीं हैं बल्कि उनके भ्रस्टाचार के तरीके इनसे ज्यादा बेहतर रहे हैं इसलिए अभीतक पकड़े नहीं गए . जब लोग यह कहते हैं खासकर मध्यमवर्ग युवा कि अमुक नेता पढ़ा लिखा नहीं है या भ्रस्टाचार में लिप्त है, तो इनका बड़ा हास्यास्पद जवाब होता है कि सभी चोर हैं जिससे एक युवा वर्ग इनके साथ खड़ा नहीं होता है . क्योकि उसे लगता है कि कम  से कम वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलता तो है .    दूसरा यह कि सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने के लिए ये उनके साथ खड़े हैं जिन्होंने सभी प्रजातान्त्रिक मूल्यों की सार्वजनिक आहुति दी . इसका सबसे बड़ा उदहारण है बिहार में महागठबंधन के पक्ष में इनका खड़ा होना . यह वही गठबंधन है जिसके दोनों मुखियाओं ने सबसे अधिक अलोकतांत्रिक फैसले लिए हैं और धरना प्रदर्शन कर रहे लोगों पर सबसे अधिक लाठियां भी इनकी सरकारों ने हीं बरसाई है . पटना में धरना स्थल शहर से बाहर कर लोगों के अपने पक्ष रखने और बड़े जनसमूह को साथ लाने के अवसर के खिलाफ साजिश करने वाले नितीश कुमार महागठबंधन के मुखिया बने . चंद्रशेखर प्रसाद जैसे नेता की हत्या कराने वाले, जे एन यु के छात्रों के प्रदर्शन पर लाठी और गोली चलवाने वाले का सहयोग करने वाले लालू यादव के साथ खड़ा होते समय ये सभी लोग ये भूल जाते हैं कि ये वही लोग हैं जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या की है . ऐसे में इनसे लोकतांत्रिक मूल्यों की लड़ाई की उम्मीद रखना खुद को धोखे में रखना हीं है . जिस समय ये सभी लोग महागठबंधन के पक्ष में खड़े हो रहे थे उस समय क्या इनको यह मालूम नहीं था कि सामाजिक अभियन्त्रिकी के हथियार से दलितों, पिछड़ों और अकलियतों की एकता विखंडित करने वाला नितीश कुमार हीं है . क्या इनको यह नहीं मालूम था कि यादवों को लाठी देकर चौराहे पर खड़ा करने वाले लालू यादव हैं, जिसके वजह से आज पिछड़ी जातियों की एकता ख़त्म हुई . यहाँ तक कि दलित भी कई जगह यादवों से संघर्ष कर रहे हैं, और धीरे धीरे कर सभी सांप्रदायिक ताकतों के पक्ष में जा रहे हैं . प्रश्न यह है कि लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वाश रखने वाले लोग आज से 3 वर्ष पूर्व जब सांप्रदायिक ताकतों के विरुद्ध खड़े हुए तो उस समय से विकल्प क्यों तलाशना शुरू नहीं किया ? क्या ये लोग अपनी रणनीति बनाने में चुक गए ? क्या ये थक चुके हैं ? क्या ये निराश हैं ? क्या ये विकल्प तैयार करने में असक्षम है (जबकि आज भी ज्यादा लोग ऐसे हैं जिनके पास 74 आन्दोलन का अनुभव है) ? इन प्रश्नों का उत्तर तलाशना अब लाजिमी है ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों के रक्षा और सामाजिक न्याय के लिए आन्दोलन हो . नया भारत (जैसा कि प्रधान सेवक ने नारा दिया है) नहीं लोकतांत्रिक मूल्यों को मानने और व्यवहार करने वाला भारत चाहिए .  

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