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लोक मैत्री

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शहर में  लोक मैत्री के खूब चर्चे हैं मसलन लोक मैत्री अस्पताल, लोक मैत्री पुलिस एवं लोक मैत्री सेवाएँ । एक दिन मुझे भी पुलिस महकमे के एक पदाधिकारी ने लोक मैत्री पुलिस पर परिचर्चा में अपना वक्तव्य देने को बुलाया था । परिचर्चा में अपना वक्तव्य देने के बाद अभी बैठा ही था कि घर से फ़ोन आ गया कि बेटे ने छत से गिरकर हाथ तोड़ लिया है ।
मैं तेजी से बाहर निकला और अपनी कार लेकर अस्पताल की ओर भागा ।
चौराहे पर पंहुचा ही था कि उल्टी दिशा से एक रिक्शा आते दिखा ... इससे पहले कि मै कुछ समझता .... हलाकि मैंने ब्रेक लगाया ... लेकिन तबतक रिक्शावाला हड़बड़ा  गया ...  वह डरकर ब्रेक भी नहीं लगा पाया और उसने मेरी गारी में टक्कर मार दी .... नतीजतन उसका रिक्शा उलट गया और वह गिर पड़ा। 
मैं कार से बाहर निकला और उसको घुड़की पिलाई।  निरीह प्राणी की तरह रिक्शे वाले ने हाथ जोड़कर कहा साहब गलती हो गई। उसकी मुद्रा देखकर मेरा गुस्सा काफूर हो गया।  उसपर मैं जल्दी में भी था सो रिक्शा उठाने में उसकी मदद करने लगा। 
इतने में एक पुलिस वाला जो चौराहे पर पेड़ के नीचे खड़े रहकर अपनी ड्यूटी कर रहा था वह हमारे पास पहुंचा और मेरी ओर मुख़ातिब होकर बोला "मार दिए न गरीब आदमी को" !
मुझे ये जानकर अच्छा लगा कि चलो, इसे हमदर्दी है रिक्शेवाले से, आखिर लोक मैत्री पुलिस है। 


लेकिन मैं उसके सामने अपनी बेगुनाही भी साबित करना चाहता था...और यह अत्यावश्यक भी था ...   क्योंकि जब भी सड़क पर किसी को ठोकर लगता है तो ठोकर मारने वाले, और ठोकर लगने वाले के अलावा, वहां इकठ्ठा हुआ सभी व्यक्ति को अपने न्यायधीश होने का गुमा होने लगता है ... और देश की अदालतों में फैसला तो वादी के स्वर्ग सिधारने के बाद भी आता है लेकिन इन न्यायधीशों की खूबी यही है कि ये फैसला त्वरित करते हैं ...  न्यायपालिका और कार्यपालिका के लेटलतीफी और नकारेपन के खिलाफ जो गुस्सा होता है वो उसका बदला यहीं लेने लगते हैं। 
इससे पहले की मैं अपनी बेगुनाही साबित करता ...  तबतक रिक्शे वाले ने पुलिस वाले को हाथ जोड़कर कहा कि साहब, इसमें इनकी गलती नहीं थी।  लेकिन पुलिस वाले ने उसे बीच में ही टोकते हुए चुप रहने को कहा....और रिक्शावाला डर कर चुप हो गया। 
मैंने बात बिगड़ता देख अंग्रेजी में बोलना शुरू किया ताकि पुलिस वाले पर धौंस जमाया जाय। वैसे भी कहा जाता है कि अंग्रेजी बोलने के मतलब है कि आप ज्यादा जानकर और रसूख वाले हैं ... एक कहावत है अंग्रेजी में "एवरीथिंग साउंड्स गुड इन इंग्लिश" ...  
5 मिनट तक मेरी अंग्रेजी सुनने के बाद पुलिस वाले ने कहा ... वह सब तो ठीक है लेकिन धक्का तो लगबे न किया है ... है कि नहीं ?... क्या जी ?... रिक्शे वाले से पूछा ... रिक्शे वाले ने हामी में सर हिलाया  ... नहीं हिलाता तो अगले दिन उसकी शामत आ जाती । 
पुलिस वाले ने  मैत्रीपूर्ण तरीके से इसका रास्ता सुझाया ... छोड़िये ... एक काम कीजिये ... 50 रूपये रिक्शे वाले को दे दीजिये इसका पेडल टूट गया है ... और 100 रुपया हमलोग को दे दीजिये आखिर आपही लोग के सेवा के लिए न धुप आ बरसात में  में खड़ा रहते हैं ... मैंने सोंचा इतनी लोक मैत्री पुलिस है अपनी, हम बेकार ही इसपर चर्चा करते रहते हैं ... 


Author: Ranvijay Kumar (Social and Political activist, associated with many civil and political movement. To read more his writings please visit his personal blog by clicking here)

Pics Credit: https://www.dreamstime.com/stock-illustration-people-group-participation-logo-concept-happy-together-image86419162 

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